विक्रम और बेताल की रहस्यमयी कथा: शुक्ला की निस्वार्थ भलाई का अनोखा रहस्य!

विक्रम और शुक्ला – बेताल पच्चीसी की कहानी

क्या शुक्ला का निस्वार्थ प्रेम सही था? जानिए विक्रम और बेताल की इस रहस्यमयी कहानी में नैतिकता और न्याय का गूढ़ रहस्य!

प्राचीन काल में उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य अपनी वीरता, बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। वे हमेशा चुनौतियों का सामना करने और सत्य की खोज में लगे रहते थे। एक दिन, एक तांत्रिक ने उन्हें शव साधना करने के लिए एक पीपल के पेड़ पर लटके हुए बेताल को लाने का आदेश दिया। विक्रमादित्य ने अपने साहस और संकल्प के साथ इस कार्य को स्वीकार किया।

जब वे शमशान घाट पहुंचे, तो उन्होंने पीपल के पेड़ से बेताल को उतारा और कंधे पर रखकर चल पड़े। जैसे ही वे आगे बढ़े, बेताल ने एक कहानी सुनानी शुरू कर दी और अंत में राजा से एक प्रश्न पूछा। अगर राजा सही उत्तर जानते हुए भी न देते, तो उनका सिर फट जाता, और अगर उत्तर देते, तो बेताल वापस उड़कर पेड़ पर चला जाता।

इस बार, बेताल ने राजा विक्रम को शुक्ला नामक व्यक्ति की कहानी सुनाई।


शुक्ला की कथा

राजा विक्रमादित्य के शासन में अयोध्या नगर में एक अत्यंत बुद्धिमान और धनी ब्राह्मण रहता था। उसका नाम शुक्ला था। वह धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था और अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। परंतु उसके जीवन में एक विचित्र घटना घटी।

एक दिन, जब शुक्ला मंदिर में पूजा कर रहा था, तो उसने अचानक एक रहस्यमयी स्त्री को देखा। वह अद्भुत रूपवती थी, लेकिन उसके चेहरे पर गहरी चिंता झलक रही थी। शुक्ला ने उससे पूछा, "हे देवी, आप कौन हैं, और इस प्रकार दुखी क्यों दिख रही हैं?"

वह स्त्री बोली, "मैं एक नगरवधू हूँ। मेरा मन अब इस सांसारिक जीवन से ऊब चुका है। मैं एक सच्चे और धार्मिक व्यक्ति की खोज में हूँ, जो मुझे इस मायाजाल से मुक्त कर सके।"

शुक्ला उसकी बातों से प्रभावित हुआ और उसे अपने घर ले गया। उसने अपनी पत्नी से कहा, "यह स्त्री अब हमारे परिवार का हिस्सा होगी। हमें इसे सम्मान और प्रेम देना चाहिए।" उसकी पत्नी ने बिना किसी संकोच के उसे स्वीकार कर लिया।

समय बीतता गया, और वह स्त्री शुक्ला और उसकी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन एक दिन, जब शुक्ला नगर से बाहर गया हुआ था, तो एक अन्य व्यापारी उस स्त्री पर मोहित हो गया और उसे अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हो गया।

जब शुक्ला लौटा, तो उसने अपनी पत्नी से पूछा, "हमारी नई बहन कहाँ है?"

पत्नी ने उत्तर दिया, "वह चली गई, शायद अपने पुराने जीवन में वापस लौट गई।"

शुक्ला यह सुनकर दुखी हुआ, लेकिन उसने इसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया।

कुछ वर्षों बाद, जब शुक्ला तीर्थ यात्रा पर गया, तो उसने उस स्त्री को एक राजा की रानी के रूप में देखा। वह पहले की तरह ही सुंदर थी, लेकिन अब उसके चेहरे पर संतोष का भाव था।

उसने शुक्ला को पहचान लिया और कहा, "हे शुक्ला, तुमने मुझे सहारा दिया था जब कोई मुझे स्वीकार नहीं करता था। तुम्हारी कृपा से ही मैं अपने जीवन के सही मार्ग पर चल सकी। यह सब तुम्हारी भलाई और प्रेम का परिणाम है।"


बेताल का प्रश्न

इतनी कथा सुनाने के बाद बेताल ने राजा विक्रम से पूछा, "हे राजन, शुक्ला ने उस स्त्री की सहायता निस्वार्थ भाव से की थी। लेकिन यदि वह स्त्री अपने पुराने जीवन में लौट गई थी, तो क्या शुक्ला को उसके प्रति कोई अधिकार जताना चाहिए था? क्या उसने सही किया कि उसने कोई प्रतिशोध नहीं लिया?"

राजा विक्रम ने उत्तर दिया, "शुक्ला ने धर्म का पालन किया था। उसने बिना किसी स्वार्थ के उस स्त्री की सहायता की और उसके भविष्य को उज्ज्वल बनाया। किसी भी व्यक्ति को अपने अहंकार या स्वामित्व के भाव में आकर अपने द्वारा किए गए उपकार का प्रतिदान नहीं मांगना चाहिए। यही सच्ची सेवा और मानवता है। अतः शुक्ला का आचरण पूरी तरह उचित था।"

यह उत्तर सुनते ही बेताल हँसा और बोला, "हे राजन, तुमने उत्तर दे दिया, इसलिए मैं फिर से उड़कर पेड़ पर जा रहा हूँ।"

और यह कहकर बेताल फिर से पीपल के पेड़ पर जा लटका।

राजा विक्रम ने धैर्य नहीं खोया। वे पुनः बेताल को पकड़ने के लिए आगे बढ़े, क्योंकि वे जानते थे कि सच्चाई और न्याय के मार्ग पर चलना ही उनका कर्तव्य था।


कहानी से शिक्षा

इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा उपकार निस्वार्थ होता है। जब हम किसी की सहायता करते हैं, तो बदले में कुछ पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। हमें अपने अहंकार से ऊपर उठकर दूसरों के हित के लिए कार्य करना चाहिए, क्योंकि यही सच्चा धर्म है।यह विक्रम और बेताल की उन अद्भुत कहानियों में से एक है, जो हमें नैतिकता, न्याय और बुद्धिमत्ता का संदेश देती हैं।

टिप्पणियाँ