जानें कैसे एक ब्राह्मण ने अग्नि परीक्षा से अपनी सच्चाई साबित की और व्यापारी का धोखा उजागर किया (बेताल पचीसी की कहानी) | Hindi Kahaniya
ब्राह्मण का सच्चाई और धोखा (बेताल पचीसी की कहानी)
प्राचीन काल में उज्जैन नगर में एक राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे न केवल वीर और बुद्धिमान थे, बल्कि न्यायप्रिय भी थे। एक दिन एक साधु ने राजा को एक विशेष कार्य सौंपा। साधु ने उनसे कहा कि उन्हें एक शव लेकर आना होगा, जो एक पेड़ पर लटका हुआ है। राजा ने साधु के आदेश को स्वीकार किया और शव को लेने के लिए श्मशान घाट गए।
श्मशान में लटकते शव में बेताल नामक एक प्रेत का वास था। जब राजा ने शव को उठाया, तो बेताल ने उन्हें एक शर्त दी। बेताल ने कहा, "मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊंगा। अगर तुमने कहानी सुनने के बाद उत्तर दिया, तो मैं वापस अपने स्थान पर लौट जाऊंगा। लेकिन अगर तुमने चुप्पी साधी, तो मैं तुम्हारे सिर को फोड़ दूंगा।" राजा ने यह शर्त मान ली।
बेताल ने कहानी शुरू की:
एक समय की बात है, एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम हरिदत्त था। वह बहुत गरीब था लेकिन ईमानदार और धर्मप्रिय था। उसके पास केवल एक छोटा सा खेत था, जिससे उसकी आजीविका चलती थी। ब्राह्मण ने कड़ी मेहनत से अपने खेत में फसल उगाई और अपनी ईमानदारी से जीवनयापन किया।
एक दिन, एक व्यापारी उस गांव में आया। व्यापारी ने ब्राह्मण की सादगी और सच्चाई देखकर उससे दोस्ती कर ली। व्यापारी ने ब्राह्मण को कुछ पैसे उधार दिए और कहा, "इनसे अपनी खेती का विस्तार करो। जब तुम्हारे पास धन हो, तब इसे लौटा देना।" ब्राह्मण ने व्यापारी का धन्यवाद किया और उस पैसे का उपयोग अपने खेत को बड़ा करने में किया।
धीरे-धीरे ब्राह्मण की मेहनत रंग लाई और वह संपन्न हो गया। उसकी फसलें खूब फलने-फूलने लगीं। एक दिन व्यापारी वापस आया और अपने पैसे मांगे। ब्राह्मण ने उसे पूरा धन लौटाया और उसे एक शानदार भोज के लिए आमंत्रित किया। व्यापारी ने खुशी-खुशी आमंत्रण स्वीकार किया।
भोज के दौरान, व्यापारी ने ब्राह्मण की संपत्ति और खुशहाली देखकर ईर्ष्या की। उसने सोचा, "यह ब्राह्मण अब मुझसे अधिक संपन्न हो गया है। इसे सबक सिखाना चाहिए।" उसने एक चाल चली। उसने ब्राह्मण के घर में चोरी से एक कीमती सोने का बर्तन छिपा दिया और फिर राजा के पास जाकर शिकायत की कि ब्राह्मण ने उसका बर्तन चुरा लिया है।
राजा ने ब्राह्मण को बुलाया और पूछताछ की। ब्राह्मण ने अपनी सच्चाई बताते हुए कहा, "मैंने कोई चोरी नहीं की है।" राजा ने व्यापारी के कहने पर ब्राह्मण के घर की तलाशी ली और सोने का बर्तन बरामद हुआ।
ब्राह्मण को चोर मानकर दंड देने का आदेश दिया गया। लेकिन तभी ब्राह्मण ने कहा, "महाराज, मुझे अपनी निर्दोषता साबित करने का मौका दीजिए। अगर मैं सच्चा हूं, तो अग्नि में प्रवेश करने पर भी मुझे कुछ नहीं होगा।"
राजा ने ब्राह्मण की बात मानी। ब्राह्मण ने भगवान का स्मरण किया और अग्नि में प्रवेश किया। जैसे ही वह अग्नि में गया, अग्नि शांत हो गई और ब्राह्मण सुरक्षित बाहर निकला। यह देखकर राजा ने व्यापारी को बुलवाया और सच्चाई का पता लगाया।
व्यापारी ने अपनी गलती स्वीकार की और ब्राह्मण से क्षमा मांगी। राजा ने व्यापारी को दंड दिया और ब्राह्मण को सम्मानित किया।
कहानी समाप्त करने के बाद बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा, "राजन, बताओ कि इस कहानी में सबसे बड़ा दोषी कौन था - व्यापारी, ब्राह्मण या राजा?"
राजा ने उत्तर दिया, "सबसे बड़ा दोषी व्यापारी था, क्योंकि उसने ब्राह्मण की सच्चाई को देखकर ईर्ष्या की और उसे धोखा देने का प्रयास किया। राजा और ब्राह्मण ने अपने-अपने कर्तव्य निभाए।"
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर से पेड़ पर लौट गया। राजा ने शव को फिर से उठाया और अपने कार्य को पूरा करने के लिए आगे बढ़े।
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