कहानी: एक ब्राह्मण की कथा( बेताल पचीसी से प्रेरित)
पुराने समय की बात है। उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य अपनी न्यायप्रियता और साहस के लिए प्रसिद्ध थे। एक रात, तंत्र-मंत्र में निपुण योगी ने उनसे एक विशेष कार्य करने का अनुरोध किया। राजा को एक श्मशान से पेड़ पर लटके बेताल को लाने का काम सौंपा गया। योगी ने कहा कि बेताल एक विचित्र प्राणी है और हर बार कहानियां सुनाएगा। अगर राजा बीच में बोले, तो बेताल वापस पेड़ पर लौट जाएगा।
राजा विक्रमादित्य बेताल को कंधे पर उठाकर चलने लगे। तभी बेताल ने एक कहानी सुनानी शुरू की।
एक गांव में देवदत्त नाम का एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह ईमानदार, विद्वान और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाला था। देवदत्त रोज मंदिर में पूजा करता और अपने जीवन की कठिनाइयों को भगवान को समर्पित करता।
एक दिन देवदत्त ने सोचा कि यदि वह किसी धनी राजा के दरबार में जाएगा, तो उसे दान-दक्षिणा मिल सकती है। वह राजा के पास गया और अपनी विद्वता का परिचय दिया। राजा ने उसकी प्रशंसा की और उसे स्वर्ण मुद्राएं दीं।
लेकिन रास्ते में देवदत्त ने देखा कि एक भूखा व्यक्ति ज़मीन पर पड़ा हुआ है। उसका शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र था। देवदत्त ने सोचा, "यदि मैं इन मुद्राओं को लेकर चला गया और इस व्यक्ति की मदद न की, तो क्या मेरा ब्राह्मण होना सार्थक है?"
देवदत्त ने स्वर्ण मुद्राएं उस व्यक्ति को दे दीं और बिना किसी पश्चाताप के अपने गांव लौट आया। कुछ समय बाद, देवदत्त ने देखा कि उसके घर में चमत्कार होने लगे। खेतों में फसल लहलहाने लगी, और घर में धन-धान्य की कमी नहीं रही।
बेताल का प्रश्न:
बेताल ने पूछा, "राजा विक्रम, बताओ, क्या देवदत्त ने सही किया? क्या उसने स्वर्ण मुद्राएं देकर सही धर्म निभाया, या उसे पहले अपने परिवार के बारे में सोचना चाहिए था?"
राजा विक्रम ने उत्तर दिया, "बेताल, देवदत्त ने धर्म का पालन किया। उसका कर्तव्य केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि हर जीव के प्रति करुणा दिखाना भी उसका धर्म था। उसने जो किया, वह उसके ब्राह्मण होने का असली आदर्श था।"
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल हंसा और वापस पेड़ पर लौट गया।
शिक्षा:
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म वही है जिसमें निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद की जाए। अपना सुख-दुख भूलकर अगर कोई दूसरों का भला करता है, तो ईश्वर उसका भला स्वयं करते हैं।
.jpeg)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें