चंद्रप्रभा और उसका प्रेम (बेताल पच्चीसी की कहानी)
बहुत समय पहले, उज्जैन नगर के राजा विक्रमादित्य ने अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से अपना नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध कर रखा था। एक दिन, एक तांत्रिक ने उन्हें एक पीपल के पेड़ पर लटके बेताल को लाने का आदेश दिया। विक्रमादित्य ने साहसपूर्वक यह कार्य स्वीकार किया।
बेताल ने राजा को यह शर्त दी कि यदि रास्ते में उन्होंने कुछ कहा, तो वह उड़कर फिर से पेड़ पर जा लटकेगा। इसके साथ, बेताल ने राजा को एक कहानी सुनानी शुरू की।
कहानी: चंद्रप्रभा और उसका प्रेम
किसी समय, वाराणसी नगर में एक धनी व्यापारी का सुंदर और बुद्धिमान पुत्र था जिसका नाम चंद्रप्रभा था। वह न केवल अपने रूप के लिए बल्कि अपने गुणों के लिए भी प्रसिद्ध था। चंद्रप्रभा अपने पिता के व्यापार में सहायता करता और साथ ही कला और संगीत में निपुण था।
एक बार चंद्रप्रभा व्यापार के सिलसिले में पड़ोसी राज्य गया। वहां उसने राजा की राजकुमारी वसुंधरा को देखा। वसुंधरा अत्यंत सुंदर और गुणवान थी। पहली ही नजर में, चंद्रप्रभा को उससे प्रेम हो गया।
किंतु वसुंधरा के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक शर्त रखी थी कि जो भी युवक उनकी पुत्री से विवाह करना चाहता है, उसे तीन कठिन प्रश्नों के उत्तर देने होंगे। यदि उत्तर गलत हुआ, तो उस युवक को मृत्यु दंड दिया जाएगा।
चंद्रप्रभा ने अपने प्रेम के लिए यह चुनौती स्वीकार की। राजा ने उसे तीन प्रश्न पूछे:
1. संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु क्या है?
चंद्रप्रभा ने उत्तर दिया, "सत्य। क्योंकि सत्य के बिना संसार अधूरा है।"
2. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कौन है?
चंद्रप्रभा ने कहा, "उसका अपना क्रोध, क्योंकि क्रोध ही व्यक्ति को बर्बाद कर देता है।"
3. संसार में सबसे बड़ी शक्ति क्या है?
चंद्रप्रभा ने उत्तर दिया, "प्रेम, क्योंकि प्रेम ही जीवन का सार है और संसार को जोड़ने वाली ताकत है।"
चंद्रप्रभा के उत्तरों से राजा बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया। चंद्रप्रभा और वसुंधरा ने सुखी जीवन व्यतीत किया।
बेताल का प्रश्न
इतना कहकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा, "हे राजन, बताओ! चंद्रप्रभा ने सही उत्तर दिए थे या नहीं? यदि जानते हुए भी उत्तर नहीं दिया, तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा।"
राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया, "चंद्रप्रभा ने सत्य कहा। सत्य, क्रोध पर विजय, और प्रेम ही जीवन के सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं। यही कारण था कि राजा ने उसकी बुद्धिमत्ता को सराहा।"
राजा के उत्तर से बेताल प्रसन्न तो हुआ, पर अपनी शर्त के अनुसार फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका।
इस प्रकार बेताल ने विक्रमादित्य को अपनी बुद्धिमत्ता का प्रमाण देने पर विवश किया।
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